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तेल नहीं, अब रोटी की करिए चिंता, छह महीने में सबसे ऊंचे स्‍तर पर दाम, चेतावनी पे चेतावनी

नई दिल्‍ली: दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम बहुत तेजी से बढ़ने लगे हैं। मार्च में ग्‍लोबल फूड कीमतें सितंबर 2025 के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे आने वाले महीनों में किराने के बिलों को लेकर नई चिंताएं पैदा होने लगी हैं। इसे लेकर चेतावनी पर चेतावनी आने लगी हैं। संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) पहले ही कह चुका है कि हालात नाजुक हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अब लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी हुई है। यह ग्‍लोबल फूड मार्केट्स में नए सिरे से महंगाई के दबाव का संकेत है। वहीं, ब्रिटेन के व्‍यापार संगठन फूड एंड ड्रिंक फेडरेशन (एफडीएफ) ने भी संशोधित अनुमान जारी किए हैं। उसके अनुसार, साल के अंत तक खाद्य महंगाई 9% से ज्‍यादा हो जाने की उम्मीद है। इसे लेकर एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ईसीआईयू) के खाद्य और कृषि विश्लेषक क्रिस जैकारिनी ने आगाह किया है।

क्रिस जैकारिनी ने बताया कि जब रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के कारण जीवाश्म ईंधन का संकट पैदा हुआ तो खाद्य कीमतें तेजी से उछली थीं। 2022 और 2023 के दौरान परिवारों को खाने के लिए ज्‍यादा कीमत चुकानी पड़ी। खाद्य उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने भी इन लागतों को और बढ़ा दिया। चूंकि वेतन अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे में कई परिवारों के लिए भोजन आज भी पहले की तुलना में कम वहनीय बना हुआ है।

यह अनुमान कि खाद्य महंगाई दोहरे अंकों तक पहुंच जाएगी, बेहद चिंताजनक है। मिडिल ईस्‍ट में चल रहा युद्ध इस बात को दिखाता है कि जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता हमें कितनी जल्दी भारी पड़ सकती है। पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और कंपनियां पहले से ही ऊर्जा, परिवहन, उर्वरक और अन्य इनपुट की बढ़ी हुई लागतों को रिपोर्ट कर रही हैं। परिवारों को खरीदारी और ऊर्जा के बढ़े हुए बिलों के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

एफएओ ने भी बजाई खतरे की घंटी

वहीं, एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक मार्च में औसतन 128.5 अंक रहा। यह जरूरी वस्तुओं पर नजर रखने वाला एक प्रमुख पैमाना है। यह फरवरी की तुलना में 2.4% और साल-दर-साल 1% की बढ़ोतरी दिखाता है।

हालांकि, यह तेजी अभी भी एवरेज है। लेकिन, इसके पीछे के फैक्‍टर अब प्रोडक्‍शन और सप्‍लाई की गतिशीलता को प्रभावित करना शुरू कर रहे हैं। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ी बढ़ती ऊर्जा कीमतें इसमें शामिल हैं।

एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो तोरेरो ने बताया कि अब तक कीमतों में हुई बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कंट्रोल में रही है। उन्होंने कहा, ‘संघर्ष शुरू होने के बाद से कीमतों में बढ़ोतरी मामूली रही है। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं जिसे वैश्विक अनाज की पर्याप्त सप्‍लाई ने कुछ हद तक संतुलित किया है।’

हालांकि, इकोनॉमिस्‍ट ने आगाह किया कि अगर यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो खाद्य प्रणालियों पर इसके गहरे और अधिक स्थायी प्रभाव पड़ सकते हैं।

कौन से फैक्‍टर फूड इन्‍फ्लेशन को दे रहे हवा

  • खाद्य महंगाई का एक मुख्य कारण ऊर्जा की लागत बनी हुई है।
  • कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से परिवहन और उत्पादन का खर्च बढ़ जाता है।
  • साथ ही जैव ईंधन की मांग भी बढ़ती है।
  • इसके बदले में वनस्पति तेल जैसी वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
  • उर्वरक को खरीदने की क्षमता भी अब एक चिंता का विषय है।
  • आने वाले मौसमों में यह किसानों के बुवाई संबंधी फैसलों को प्रभावित कर सकती है।

इन चीजों के बढ़े हैं दाम

प्रमुख चीजों में गेहूं की कीमतों में 4.3% की तेज बढ़ोतरी हुई। इसका मुख्य कारण अमेरिका में फसल की बिगड़ती संभावनाएं और उर्वरक की ऊंची लागत के कारण ऑस्ट्रेलिया में बुवाई कम होने की उम्मीदें थीं। मक्का की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी हुई। इसे इथेनॉल की मजबूत मांग से समर्थन मिला। हालांकि, वैश्विक स्तर पर इसकी प्रचुर सप्‍लाई ने कीमतों में बहुत ज्‍यादा उछाल आने से रोक दिया। इसके उलट चावल की कीमतों में 3% की गिरावट आई। यह चल रही कटाई और आयात की कमजोर मांग को दर्शाती है।

वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें महीने-दर-महीने 5.1% और साल-दर-साल 13.2% की वृद्धि हुई। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और जैव ईंधन की बढ़ती मांग थी।

इस बीच, मीट की कीमतों में 1% की बढ़ोतरी हुई। इसे यूरोप में सूअर के मांस की मजबूत मांग और ब्राजील में मवेशियों की सीमित सप्‍लाई से समर्थन मिला। हालांकि, परिवहन संबंधी चुनौतियों के कारण मुर्गी और भेड़ के मांस की कीमतों में गिरावट आई।

अन्य श्रेणियों में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली। डेयरी उत्पादों की कीमतें 1.2% बढ़ीं, जबकि चीनी की कीमतों में 7.2% की तेजी आई। इसकी एक वजह यह है कि ब्राजील शायद गन्‍ने का ज्‍यादा इस्तेमाल एक्सपोर्ट के बजाय इथेनॉल बनाने में करे।

अन्य श्रेणियों में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली। डेयरी उत्पादों की कीमतें 1.2% बढ़ीं, जबकि चीनी की कीमतों में 7.2% की तेजी आई। इसकी एक वजह यह है कि ब्राजील शायद गन्‍ने का ज्‍यादा इस्तेमाल एक्सपोर्ट के बजाय इथेनॉल बनाने में करे।

आगे आ रहा है खतरा

आगे की बात करें तो एफएओ ने खाने की चीजों की सप्लाई में आने वाले संभावित खतरों के बारे में आगाह किया है। दुनिया भर में गेहूं का उत्पादन 82 करोड़ टन होने का अनुमान है। पिछले साल के मुकाबले यह करीब 1.7% कम है। यह इस बात का शुरुआती संकेत है कि सप्लाई की स्थिति तंग हो सकती है।

तोरेरो ने चेतावनी दी कि अगर मौजूदा संघर्ष 40 दिनों से ज्‍यादा चलता है तो इसका असली असर बाद में सामने आ सकता है। किसान शायद खाद का इस्तेमाल कम कर दें, बुवाई का रकबा घटा दें या फिर ऐसी फसलें उगाना शुरू कर दें जिनमें कम मेहनत और लागत लगती हो। ये ऐसे फैसले हैं जिनसे आने वाले महीनों में पैदावार कम हो सकती है और सप्लाई और भी तंग हो सकती है।

2026 में खाने की चीजों की कीमतों का भविष्य मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करेगा:

  • ऊर्जा की कीमतों की दिशा
  • किसानों के खेती से जुड़े फैसले
  • भू-राजनीतिक उथल-पुथल की अवधि

हालांकि, अभी कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, उसे संभालना मुमकिन है। लेकिन, इन क्षेत्रों में दबाव बना रहता है तो दुनिया भर में खाने की चीजों की कीमतें और भी बढ़ सकती हैं।

ब्युरो रिपोर्ट

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