तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के परिणाम बीजेपी से बीजेपी को लगा बड़ा झटका

नई दिल्ली: तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के परिणाम बीजेपी के लिए कई मायनों में बहुत ही करारा झटका है। ये चुनाव नीट पेपर लीक पर युवाओं के आक्रोश के बीच हुए हैं, इसलिए इसके राजनीतिक मायने दूरगामी हो सकते हैं, जो आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे।
जिन तीनों विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, वे बीजेपी शासित राज्यों के हैं। बिहार की पटना की बांकीपुर सीट पर बीजेपी का ही कब्जा था, लेकिन यहां उसे करारी हार मिली है। मध्य प्रदेश की दतिया सीट अभी कांग्रेस के पास ही थी और उसने अपनी सीट बरकरार रखी है, लेकिन यहां के मतदाताओं ने फिर भी भाजपा को एक संदेश देने की कोशिश की है। वहीं गुजरात की मांजलपुर सीट हमेशा से बीजेपी का गढ़ रहा है, यह गढ़ अभी भी मजबूती से कायम है, लेकिन किले में दरारें भी दिखने लगी हैं, जिसे बहुत जल्द पाटने की नौबत आ सकती है।
पटना की बांकीपुर सीट पर बड़ा उलटफेर
- सबसे बड़ा उलटफेर बिहार में राजधानी पटना के हृदय स्थल बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुआ है।
- यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे की वजह से खाली हुई, जो राज्यसभा के लिए चुने गए हैं।
- 1995 (पहले पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र था) से भाजपा इस सीट से कभी नहीं हारी थी।
नितिन नवीन के लिए यह निजी प्रतिष्ठा का भी सवाल है, क्योंकि 2006 में पिता नवीन किशोर सिन्हा की विरासत संभालने के बाद से वह लगातार पांच बार यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
बांकीपुर की हार बीजेपी की राजनीति को बड़ा झटका
- पांच राज्यों में हुए हालिया विधानसभा चुनावों में बीजेपी कहां इस बात से गदगद थी कि नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने पश्चिम बंगाल में भी बड़ी जीत दर्ज कर ली।
- लेकिन, हकीकत ये है कि नितिन नवीन अपनी सीट पर ही पार्टी के उम्मीदवार को उपचुनाव नहीं जिता सके।
- बांकीपुर की हार सिर्फ बीजेपी की हार नहीं है।
- इसको लेकर नितिन नवीन की नेतृत्व क्षमता पर सीधे सवालिया निशान लगेंगे और उन्हें पार्टी के तमाम धुरंधरों को दरकिनार कर राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बिठाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परोक्ष फैसले को लेकर भी प्रश्न पूछे जाएंगे।
बिहार में बीजेपी के लिए बजी खतरे की घंटी
- बांकीपुर विधानसभा सीट से जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर की बड़ी जीत इस बात का भी संकेत है कि इस सीट पर मतदाताओं ने ही नहीं, पार्टी के कैडर ने भी उसका साथ छोड़ दिया है।
- खास तौर पर इसकी वजह से आने वाले दिनों में सम्राट चौधरी के नेतृत्व को लेकर बीजेपी की चुनौती और बढ़ सकती है।
- बांकीपुर जैसी गारंटी वाली सीट पर बीजेपी के कैडर की हताशा बहुत ही कम वोटिंग के माध्यम से पहले ही नजर आ गया था।
- इसके पीछे भरत तिवारी के कथित फर्जी एनकाउंटर का बहुत बड़ा रोल माना जा रहा है, जिसे संभालने में बीजेपी पूरी तरह से नाकाम रही।
- अगर बीजेपी ने बिहार में अपने कैडर और मतदाताओं की मायूसी दूर करने का प्रयास नहीं किया, तो उसके लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।
बीजेपी के समर्थक ‘अंध भक्त’ नहीं हैं!
- मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी कांग्रेस की जीत एक तरह से बीजेपी के लिए मायूसी वाला परिणाम है।
- प्रदेश में मोटे तौर पर दो दशकों से ज्यादा से बीजेपी की सरकारें हैं।
- 2023 में यह सीट कांग्रेस के हाथों में जरूर चली गई थी, लेकिन उससे पहले तीन-तीन बार बीजेपी यहां से लगातार जीत चुकी है।
- यही नहीं, इस बार कांग्रेस प्रत्याशी ने यहां जीत का मार्जिन भी बढ़ाया है।
- इस तरह से बांकीपुर से दतिया तक मतदाताओं ने विपक्ष के हाथों में यह नैरेटिव जरूर थमा दिया है कि बीजेपी के खिलाफ लोग अब खड़े होने लगे हैं।
मांजलपुर में बीजेपी की बड़ी जीत में भी चेतावनी!
- गुजरात की मांजलपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज करके अपनी सियासी नाक बचा लेने में जरूर सफलता हासिल की है।
- 2008 में परिसीमन के बाद वडोदरा जिले में यह सीट बनी और पहली बार 2012 में हुए चुनाव से लेकर 2026 के उपचुनाव तक में बीजेपी यहां कभी नहीं हारी और बड़ी जीत दर्ज करती रही।
- मांजलपुर सीट का बीजेपी के लिए अहमियत इसी से समझा जा सकता है कि यह वडोदरा लोकसभा के अंदर आती है, जहां से 2014 में वाराणसी के अलावा पीएम मोदी ने अपना पहला संसदीय चुनाव जीता था।
- लेकिन, अगर 2022 के विधानसभा चुनाव और मौजूदा उपचुनाव के परिणामों की तुलना करें तो अभी बीजेपी प्रत्याशी को 67% से ज्यादा वोट जरूर मिले हैं, लेकिन 2022 के 75.85% वोट शेयर से इसमें काफी गिरावट आ चुकी है।
- गुजरात में 2027 के आखिर में विधानसभा चुनाव हैं और मांजलपुर के वोटरों ने बीजेपी को अभी से संभल जाने का संदेश दे दिया।
कुल मिलाकर तीनों विधानसभा उपचुनावों के नतीजों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैक्टर बीजेपी के जनाधार को तभी जीत में बदल सकता है, जब स्थानीय स्तर पर भी मतदाताओं का पार्टी पर भरोसा कायम रहे। वोटर अब आंख मूंदकर किसी भी प्रत्याशी को पीएम मोदी के नाम पर वोट देने से पहले विकल्प की ओर भी विचार करने लगे हैं।
ब्युरो रिपोर्ट




