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बुढार पुलिस की भारी फजीहत: बिना ‘होमवर्क’ के दबिश देने पहुंची टीम, सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक उड़ रहा मज़ाक।

शहडोल / बुढार – कहते हैं कि ‘आधी-अधूरी जानकारी और बिना तैयारी के मैदान में उतरने वाले की पीठ थपथपाई नहीं जाती, बल्कि उसकी जगहंसाई तय होती है।’ कुछ ऐसा ही वाकया शहडोल जिले के बुढार थाने की पुलिस के साथ हो गया है। बिना किसी पुख्ता कागजी कार्रवाई और पहचान सत्यापन (Identity Verification) के एक संभ्रांत परिवार के घर वारंट लेकर धमकना बुढार पुलिस को इतना भारी पड़ गया है कि अब पूरे इलाके में खाकी की किरकिरी हो रही है।*

सोशल मीडिया से लेकर चाय की टपरियों तक, लोग पुलिस की इस “हाई-टेक” लापरवाही के मजे ले रहे हैं और तंज कस रहे हैं कि क्या अब पुलिस केवल ‘सरनेम’ (उपनाम) देखकर अपराधियों की धरपकड़ करेगी?*

स्मार्ट पुलिसिंग” का खुला तमाशा: शुक्ला सरनेम मिला, तो पहुंच गए घर!*

इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यशैली किसी कॉमेडी फिल्म के सीन जैसी नजर आ रही है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहां अपराधियों का पूरा बायोडाटा एक क्लिक पर सामने आ जाता है, वहां बुढार पुलिस सिर्फ इस बात पर कार्रवाई करने निकल गई कि आरोपी और पीड़ित परिवार का उपनाम ‘शुक्ला’ था।*
गांव में एक जैसे नाम और उपनाम के कई लोग हो सकते हैं, लेकिन पुलिस ने न तो पिता का नाम मिलाने की जहमत उठाई, न ही उनके स्थायी पते या किसी पहचान पत्र (जैसे वोटर आईडी या आधार) की जांच की। पुलिस की इस जल्दबाजी और ‘शॉर्टकट’ वाले रवैये ने उनकी साख का जनाजा निकाल दिया है।*

परिजनों के ‘लीगल डोज’ से फूले पुलिस के हाथ-पांव*

मामले में बुढार पुलिस का मजाक तब और बढ़ गया जब पीड़ित परिवार (विकास शुक्ला और उनके परिजनों) ने पुलिस के सामने घुटने टेकने के बजाय उन्हें ‘कानून का पाठ’ पढ़ा दिया। परिजनों ने जब पुलिस से सीधे और तीखे सवाल दागने शुरू किए:*

“साहब, अगर मामला सालों पुराना है, तो आपकी कुंभकर्णी नींद अब क्यों खुली?”*

“इस कथित 420 (धोखाधड़ी) के मामले का असली वारंट और फाइल कहां है, जरा दिखाइए?”*

इन तार्किक और कानूनी सवालों के सामने पुलिस टीम पूरी तरह निरुत्तर हो गई। जब मौके पर ही रिकॉर्ड खंगाला गया, तो पता चला कि जिस असली गुनहगार की पुलिस को तलाश थी, वह कोई और ही है। इसके बाद पुलिस टीम को बगलें झांकते हुए और ‘सॉरी’ बोलते हुए बैरंग वापस लौटना पड़ा।*

*जनता ले रही चुटकी: “ये तो ‘सैम बहादुर’ की जगह ‘शाम बहादुर’ को पकड़ लाए!”*

*इस घटना के सामने आने के बाद से ही बुढार पुलिस स्थानीय लोगों के निशाने पर है और लोग तरह-तरह के हास्य-व्यंग्य कस रहे हैं:*
*”गूगल मैप से भी खराब है पुलिस का नेविगेशन:” स्थानीय युवाओं का कहना है कि आज के जमाने में जोमैटो-स्वीगी वाले ₹100 के खाने के लिए सही घर ढूंढ लेते हैं, लेकिन हमारी पुलिस बिना पते के सीधे वारंट तामील करने पहुंच जाती है।*

“अब सरनेम संभाल कर रखिए:” चौक-चौराहों पर लोग ठहाके लगा रहे हैं कि भाई, अगर आपका सरनेम किसी अपराधी से मिलता है, तो सुबह उठकर पहले घर के बाहर का माहौल देख लिया करो, कहीं बुढार पुलिस वारंट लेकर न खड़ी हो।*

*सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़: स्थानीय वॉट्सऐप ग्रुप्स और फेसबुक पर पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर लोग खूब चटकारे ले रहे हैं कि “अपराधी कोई भी हो, पुलिस बस ‘शुक्ला जी’ के घर जाएगी।”*

*लापरवाही भारी, प्रतिष्ठा पर वार*

*भले ही लोग इस मामले को हास्य के रूप में देख रहे हों, लेकिन यह पुलिस प्रशासन की एक बेहद गंभीर और डराने वाली चूक है। किसी निर्दोष नागरिक के दरवाजे पर पुलिस की गाड़ी आकर खड़ी होना और उन पर धोखाधड़ी का आरोप लगना, समाज में उनकी इज्जत को तार-तार कर देता है।*
*जनता का कहना है कि बुढार पुलिस को इस भारी फजीहत से सबक लेना चाहिए। अपनी ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ का ढिंढोरा पीटने वाली खाकी को ज़मीनी स्तर पर अपना ‘होमवर्क’ मजबूत करना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह सार्वजनिक रूप से अपनी किरकिरी न करानी पड़े और किसी निर्दोष को मानसिक प्रताड़ना न झेलनी पड़े।

ब्युरो रिपोर्ट

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