अपराध - दुर्घटनाराष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय

बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद सीएम सम्राट चौधरी अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर बीजेपी के कई नेता इशारों में ही सम्राट मॉडल एनकाउंटर पर उठा रहे सवाल ।

पटना: भोजपुर एनकाउंटर ने सम्राट मॉडल के उद्देश्य को काफी पीछे ढकेल दिया है। अपराधियों पर एनकाउंटर और हॉफ एनकाउंटर को ले कर राजनीतिक फलसफे पर भले आरोपों का महल खड़ा किया जाता रहा हो। राजद ने भी एक ही जाति का एनकाउंटर जैसे सवाल उठाये हो, पर जनमानस स्तर पर या मीडिया के गलियारों में सम्राट एनकाउंटर आलोचना के दायरे में न आ कर उस अभियान में साथ देते खड़ा नजर आया। लेकिन पुलिस प्रशासन के ओवर कॉन्फिडेंस या फिर या पूर्वाग्रह से ग्रसित पुलिसिया टीम ने भरत तिवारी का एनकाउंटर कर सम्राट सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।

विपक्ष के साथ BJP के अंदर से भी सवाल

भोजपुर एनकाउंटर ने सम्राट सरकार पर सवाल तो खड़े कर डाले हैं। बीजेपी भी इस मसले पर बंटती हुई दिख रही है। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि यह दुर्भाग्य है। हालांकि भरत तिवारी की भाषा भी ठीक नहीं थी। पर उसने जब सरेंडर कर दिया, हथियार फेंक दिया तो पुलिस को एनकाउंटर नहीं करनी चाहिए था। कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भोजपुर एनकाउंटर पर कहा कि यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है । पुलिस की लापरवाही साफ झलक रही है और जिस मामले का आसानी से समाधान किया जा सकता था, उसे इस तरह अंजाम देना उचित नहीं था। पुलिस प्रशासन ने स्थिति को संभालने में सूझबूझ नहीं दिखाई। सरकार इस पूरे मामले को बहुत गंभीरता से ले रही है । किसी भी सभ्य समाज में रक्षक भक्षक नहीं बन सकता ।

बीजेपी के कई नेताओं ने पुलिस को कोसा

बीजेपी नेता ऋतुराज सिन्हा ने कहा कि भरत भूषण तिवारी की मौत दुखद और चिंताजनक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि रक्षक ही भक्षक न बन जाएं। बक्सर से बीजेपी विधायक आनंद मिश्रा ने भी सुझाव दिया कि स्थिति को अलग तरह से संभाला जा सकता था। अगर स्थानीय पुलिस प्रशासन ने समय पर, सही और व्यावहारिक कदम उठाए होते, तो स्थिति को ज्यादा संवेदनशीलता के साथ संभाला जा सकता था। उन्होंने इसमें शामिल अधिकारियों को सस्पेंड करने का समर्थन किया और निष्पक्ष जांच की मांग भी की।

योगी बनाम सम्राट मॉडल की तुलना

अब रहा योगी बनाम सम्राट मॉडल। तो ऐसा नहीं कि यू पी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सवाल खड़े नहीं हुए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाले पुलिस एनकाउंटर पर सवाल उठते रहे हैं और मानवाधिकार आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट तक ने राज्य सरकार से इन मामलों में जवाब-तलब किया है। लेकिन योगी आदित्यनाथ को एक बड़े जनमानस का समर्थन मिला। इसकी वजह से यूपी पुलिस के विरुद्ध जनमानस का गुस्सा उस तरह से नहीं उभरा जिस तरह से भोजपुर में फर्जी मुठभेड़ के बाद दिख रहा है। यूपी में जितनी गोलियां लगीं वो अपराधियों के शरीर में लगीं, लेकिन बिहार में भरत तिवारी का मामला बिल्कुल अलग है। वो कोई अपराधी नहीं था। यूपी में एनकाउंटर के डर से अपराधियों में खौफ पैदा हुआ है। उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध, माफिया राज और गुंडागर्दी में भारी कमी आई है, जिसे एक बड़े जनसमर्थन का आधार माना जाता है।लेकिन भोजपुर एनकाउंटर पर तो क्या बीजेपी और क्या राजद नेता, हमले की तोप का मुंह बिहार सरकार की तरफ ही घूम गया है। भोजपुर का जनमानस तो पहले से ही पुलिस प्रशासन पर उखड़ा नजर आ रहा। जनता सड़कों पर उतर आई।

भरत तिवारी की मौत पूरी तरह से फर्जी एनकाउंटर है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तक भरत हाथ में पिस्टल लिए रहा, पुलिस उसे सरेंडर करने के लिए समझाती रही। जब उसने पुलिस को पिस्टल सौंप दी तब उसे गोली मारी गई। क्यों?

फर्जी एनकाउंटर : प्रवीण बागी

वरिष्ट पत्रकार प्रवीण बागी भी घटनास्थल पर गए थे। वहां से लौटने के बाद NBT से बातचीत में उन्होंने कहा कि ‘भोजपुर के बिलौटी (बेलवटी) गांव में पुलिस एनकाउंटर में भरत तिवारी की मौत पूरी तरह से फर्जी एनकाउंटर है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तक भरत हाथ में पिस्टल लिए रहा, पुलिस उसे सरेंडर करने के लिए समझाती रही। जब उसने पुलिस को पिस्टल सौंप दी तब उसे गोली मारी गई। क्यों? दुर्दांत अपराधियों को भी एनकाउंटर में पुलिस पैर में एक गोली मारती है , लेकिन भरत को 4 गोली मारी गई। उसे पेट में भी गोली मारी गई। इससे पता चलता है कि पुलिस की वो टीम उसे मारने का इरादा लेकर ही स्पॉट पर गई थी। वह अपराधी नहीं था, विस्थापितों की और स्थानीय लोगों की समस्या को लेकर आवाज उठाता था। ग्रामीण बताते हैं कि उसके पास कुछ नेताओं और अधिकारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ सबूत थे, इसलिए उच्चस्तरीय साजिश के तहत उसकी हत्या की गई।’

राजनीति हो रही है: वत्स

राजनीतिक विश्लेषक रामबन्धु वत्स का कहना है कि भोजपुर के भरत तिवारी के एनकाउंटर पर सब अपने-अपने हिस्से की राजनीति कर रहे हैं। एनकाउंटर और बुलडोजर के मामलों में योगी आदित्यनाथ के तर्ज पर ही अब बिहार में सम्राट चौधरी भी चर्चित हो रहे हैं लेकिन दोनों के एनकाउंटर मॉडल में अंतर है। योगी आदित्यनाथ का एनकाउंटर मॉडल मुख्यतः उन दुर्दांत अपराधियों के विरुद्ध दिखाई देता है, जो वर्षों से पुलिस, प्रशासन और आम जनता के लिए गंभीर चुनौती बने हुए थे। इसके विपरीत, बिहार में सम्राट चौधरी का मॉडल ’48 घंटे में इलाज’ कई बार जल्दबाजी वाली प्रतीत होती है। इसमें कोई संशय नहीं कि भरत तिवारी का ऐसा कोई अपराध नहीं था, जिसके लिए उसका एनकाउंटर किया जाए। उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जा सकता था। हालांकि, एनकाउंटर के अन्य तरीकों में बिहार का ऑपरेशन लंगड़ा को अपेक्षाकृत संतुलित पहल माना जा सकता है, क्योंकि इसमें कई मामलों में आरोपियों को पैरों में गोली मारकर गिरफ्तार किया गया, ताकि उनकी जान न जाए और वे कानून के सामने पेश किए जा सकें। किसी भी प्रकार की जल्दबाजी न्याय व्यवस्था और कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकती है।

ब्युरो रिपोर्ट

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