45 हजार लीटर से पूरा मालवा मालपुए खा लेता, मोहन यादव जी?
अभी कुछ ही दिन पहले हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी देश की जनता से खर्चे कम करने के लिए तेल कम खाने की अपील की थी फिर इस तरह सरकारी खर्चे पर पूरे देश में इस तरह के आयोजन का क्या मतलब। जनता के टैक्स के पैसों कई करोड़ रुपये तेल और दिये में भा बहा दिए गए।

विशेष समाचार भोपाल / उज्जैन – मध्यप्रदेश में अब जन्मदिन भी छोटे-मोटे नहीं मनाए जाते। जन्मदिन अगर प्रधानमंत्री का हो तो फिर दीपक भी लाखों में जलेंगे, तेल हजारों लीटर में खर्च होगा और व्यवस्था ऐसी होगी कि लगेगा जैसे कोई राजकीय महोत्सव नहीं, बल्कि रोशनी का महासमर होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उज्जैन में ‘सेवा से संकल्प अभियान’ के तहत 25 लाख से ज्यादा दीपक जलाने की तैयारी है। शिप्रा के घाटों से लेकर श्री महाकाल लोक तक दीपों का महासागर दिखाई देगा। कार्तिक मेला ग्राउंड में करीब सात लाख दीपों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आकृति बनाई जाएगी। आयोजन के लिए करीब 25 हजार वॉलेंटियर लगाए जाने की बात सामने आई है। दीप जलाने के लिए लगभग 45 हजार लीटर खाद्य तेल, एक हजार किलो कपूर, 53 हजार मोमबत्तियां और 10 हजार माचिस की व्यवस्था की गई है।
अब साहब, दीपक जलेंगे तो रोशनी होगी ही। रोशनी होगी तो तस्वीरें आएंगी। तस्वीरें आएंगी तो सोशल मीडिया चमकेगा और फिर पूरा देश देखेगा कि उज्जैन में प्रधानमंत्री का जन्मदिन कितनी भव्यता से मनाया गया। लेकिन इसी रोशनी के बीच मालवा का एक सवाल अंधेरे में खड़ा है 45 हजार लीटर खाद्य तेल आखिर दीपक में जलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
मालवा में किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार की रसोई में तेल की बोतल थोड़ी जल्दी खत्म हो जाए तो महीने का बजट हिल जाता है। घर में पकौड़े बनाने हों तो गृहिणी पहले तेल की कीमत देखती है, फिर कढ़ाई चढ़ाती है। त्योहार पर पूड़ी-मालपुए बनाने हों तो तेल का हिसाब लगाया जाता है। लेकिन उज्जैन में 45 हजार लीटर खाद्य तेल दीपक जलाने के लिए तैयार है। अब मालवा का कोई आदमी अगर अपने घर में मालपुए बनाने के लिए तेल ढूंढता रह जाए तो उसे शायद उज्जैन की तरफ देखना चाहिए। वहां इस बार मालपुए से बड़ा लक्ष्य है दीपक!
सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री का जन्मदिन क्यों मनाया जा रहा है। मनाइए, खुशी मनाइए, दीप जलाइए, शुभकामनाएं दीजिए। लोकतंत्र में किसी के जन्मदिन पर उत्सव मनाने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सवाल तब पैदा होता है जब आयोजन का आकार इतना बड़ा हो जाए कि उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के हिसाब-किताब पर जनता की नजर जाना स्वाभाविक हो जाए।
45 हजार लीटर खाद्य तेल कोई छोटी मात्रा नहीं है। यह ऐसा आंकड़ा है जिसे सुनकर मालवा की रसोई और सरकारी आयोजन के बीच का अंतर साफ दिखाई देने लगता है। एक तरफ परिवार तेल की कीमत देखकर अपनी रसोई का बजट बनाता है, दूसरी तरफ हजारों लीटर तेल दीपक में जलाने के लिए जुटाया जाता है। इसे कोई उत्सव कह सकता है, कोई आस्था कह सकता है, कोई आयोजन की भव्यता कह सकता है, लेकिन पत्रकार का काम इन सबके बीच सवाल पूछना है।
और सवाल सिर्फ तेल का नहीं है। एक हजार किलो कपूर कहां से आया? 53 हजार मोमबत्तियां किसने खरीदीं? 10 हजार माचिस की डिब्बियां किस दर पर खरीदी गईं? 25 लाख से ज्यादा दीपकों की व्यवस्था में कितना खर्च हुआ? तेल की खरीद किसने की? भुगतान किस मद से हुआ? यदि निजी संस्थाओं ने खर्च किया है तो ठीक, लेकिन यदि सरकारी मशीनरी, सरकारी कर्मचारी या सार्वजनिक धन का उपयोग हुआ है तो उसका पूरा विवरण जनता के सामने होना चाहिए।
क्योंकि सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक या निजी आयोजन की सजावट के लिए नहीं, जनता की सेवा के लिए होते हैं। यदि किसी आयोजन में सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी ड्यूटी किस आदेश के तहत लगाई गई और उस दौरान उनके नियमित सरकारी काम का क्या हुआ। सरकार के कर्मचारी यदि दीपक जलाने, आयोजन संभालने या किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन को भव्य बनाने में लगाए जाते हैं तो इस व्यवस्था की वैधानिक और प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
उज्जैन महाकाल की नगरी है। यहां दीपोत्सव कोई नई बात नहीं है। यहां आस्था की रोशनी सदियों से जलती आई है। महाकाल की नगरी को रोशन करने के लिए जनता स्वयं आगे आती है। लेकिन जब लाखों दीपक किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन के साथ जोड़े जाते हैं, तब आयोजन और सरकारी व्यवस्था की सीमाओं पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
सात लाख दीपों से प्रधानमंत्री की आकृति बनाना निश्चित रूप से बड़ा दृश्य होगा। ड्रोन कैमरे ऊपर से तस्वीर लेंगे, सोशल मीडिया पर वीडियो चलेंगे, नेता इसे उपलब्धि बताएंगे और समर्थक इसे उत्सव की तरह पेश करेंगे। लेकिन उन तस्वीरों के बाहर भी एक उज्जैन है, एक मालवा है और एक आम आदमी है, जो यह देख रहा है कि उसके आसपास की समस्याओं के बीच सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं।
जिस प्रदेश में कई परिवार महंगाई से जूझ रहे हैं, जहां किसान अपनी लागत का हिसाब लगाता है, जहां छोटे दुकानदार दिनभर दुकान पर बैठकर दो पैसे बचाने की कोशिश करते हैं, वहां 45 हजार लीटर खाद्य तेल दीपक में जलता देखकर सवाल उठना कोई अपराध नहीं है। यह सवाल सरकार के खिलाफ नहीं, व्यवस्था के पक्ष में है। आखिर सार्वजनिक संसाधन जनता के लिए हैं और जनता को उनके उपयोग का हिसाब मांगने का अधिकार है।
दीपक जलाना बुरी बात नहीं है। लेकिन दीपक की लौ तभी सुंदर लगती है जब उसके पीछे पारदर्शिता की रोशनी भी हो। वरना लाखों दीपक जलाकर भी सवालों का अंधेरा खत्म नहीं होता।
मालवा की जनता इतनी भोली भी नहीं कि केवल दीपों की चमक देखकर सब भूल जाए। वह महाकाल के सामने सिर भी झुकाती है और जरूरत पड़ने पर सरकार से सवाल भी पूछती है। यही लोकतंत्र है। यहां नागरिक सिर्फ तालियां बजाने के लिए नहीं होता, वह हिसाब पूछने के लिए भी होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं। उज्जैन में दीप जलें, शहर रोशन हो, आयोजन शांतिपूर्ण हो और महाकाल की नगरी की प्रतिष्ठा बढ़े। लेकिन 45 हजार लीटर खाद्य तेल की कहानी भी जनता को बताइए। आखिर यह तेल कहां से आया, किसने खरीदा और किसके पैसे से खरीदा गया?
क्योंकि 25 लाख दीपों की रोशनी कुछ घंटों बाद बुझ जाएगी, कपूर खत्म हो जाएगा, मोमबत्तियां पिघल जाएंगी और माचिस की तीलियां राख हो जाएंगी। लेकिन 45 हजार लीटर तेल का सवाल वहीं खड़ा रहेगा।
और मालवा आखिर मालवा है साहब, वह सवाल पूछे बिना मानने वाला नहीं।मोहन यादव जी, 45 हजार लीटर तेल से तो पूरा मालवा मालपुए खा लेता… फिर इतना तेल दीपक में क्यों जला दिया?
ब्यूरो रिपोर्ट




