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BIG BREAKING: केंद्र सरकार की सर्वदलीय बैठक शुरू ।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आज शाम 5 बजे पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को लेकर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद बढ़े तनाव के मद्देनज़र की गई है। बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर पार्टी नेताओं को वर्तमान स्थिति से अवगत कराएंगे। इस बैठक का उद्देश्य संकट के प्रभावों और सरकार की तैयारियों पर सभी दलों को जानकारी देना है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू के कार्यालय के अनुसार, यह बैठक संसद भवन में होगी। हालांकि विपक्ष के नेता इस कदम पर संतुष्ट नहीं हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ब्रीफिंग की बजाय संसद में बहस की मांग की है। वहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि वे केरल में कार्यक्रम में शामिल होने के कारण बैठक में उपस्थित नहीं हो पाएंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सोमवार और मंगलवार को संसद में दिए गए संबोधन के बाद यह बैठक हो रही है। अपने भाषणों में पीएम मोदी ने कहा कि देश को हर चुनौती के लिए तैयार रहना चाहिए।

ईरान-इज़राइल-अमेरिका संघर्ष के बुरे प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने ईंधन, आपूर्ति श्रृंखला और उर्वरकों जैसे क्षेत्रों में रणनीतियों को लागू करने के लिए सात अधिकार प्राप्त समूह (Empowered Groups) गठित किए हैं। इन समूहों का उद्देश्य संकट के प्रभाव को कम करना और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। सर्वदलीय बैठक में कई राजनीतिक दलों की भागीदारी भी अलग रही। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी बैठक में शामिल होंगे और पश्चिम एशिया संकट पर केंद्र के कदमों पर चर्चा करेंगे। वहीं, TMC सांसद सौगत रॉय ने बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी प्राथमिकता भाजपा के साथ राजनीतिक लड़ाई पर है, इसलिए वे बैठक में नहीं जाएंगे। ANI की रिपोर्ट के अनुसार रॉय ने स्पष्ट किया कि यह बैठक उनकी पार्टी के एजेंडे से मेल नहीं खाती। बैठक के लिए विभिन्न दलों के नेता और मंत्री संसद भवन में पहुंच चुके हैं। इसमें JDU के राजीव रंजन सिंह और संजय झा, कांग्रेस नेता तारिक अनवर और मुकुल वासनिक, तथा पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी शामिल हैं। बैठक का मुख्य एजेंडा पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, संभावित आर्थिक प्रभाव और भारत की रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना है।

इस बैठक को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने बैठक को प्रतीकात्मक बताया तो कुछ ने इसे आवश्यक कदम माना। इसके अलावा, बैठक में शामिल दलों को संकट से जुड़े तेल, गैस, उर्वरक, निर्यात-आयात और आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव का विश्लेषण भी साझा किया जाएगा। बैठक में यह भी चर्चा होगी कि संकट के चलते भारत की आर्थिक और सुरक्षा स्थिति को कैसे स्थिर रखा जाए। बैठक की रूपरेखा में विदेशी नीति, सुरक्षा उपाय और घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना प्रमुख विषय होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बैठक न केवल राजनीतिक दलों के बीच संवाद बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि सरकार की तैयारियों और रणनीतियों को पारदर्शिता से साझा करने का अवसर भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ही कहा था कि देश को वैश्विक संकटों और युद्ध जैसी परिस्थितियों के लिए सतत तैयार रहना होगा। सर्वदलीय बैठक के जरिए विभिन्न दलों को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराना और संभावित समाधान पर सुझाव लेना सरकार का लक्ष्य है।

बैठक में भाग लेने वाले दलों के नेता और मंत्री संकट के निवारण, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और रणनीतियों पर विचार-विमर्श करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में बढ़ते तनाव और उसके आर्थिक प्रभाव को देखते हुए यह बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसमें प्रमुख मुद्दे जैसे ईंधन आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा, उर्वरक उत्पादन और निर्यात-आयात की स्थिति पर केंद्र सरकार की तैयारियों की समीक्षा होगी। साथ ही, विपक्षी दलों को सरकार की रणनीतियों से अवगत कराना और उनकी प्रतिक्रियाओं को समझना बैठक का उद्देश्य है। विभिन्न दलों की भागीदारी से यह स्पष्ट होता है कि सरकार संकट के समय सभी पार्टियों के साथ संवाद और सहयोग को महत्व देती है। AIMIM और कांग्रेस के प्रतिनिधियों की भागीदारी इस बैठक को गंभीरता और व्यापक दृष्टिकोण देती है। वहीं, TMC का बहिष्कार राजनीतिक मतभेदों को भी उजागर करता है। बैठक के बाद संसद में संभावित बहस और सुझावों के माध्यम से सरकार अपनी रणनीतियों को और सुदृढ़ कर सकती है। इस बैठक का फोकस मुख्य रूप से संकट की वर्तमान स्थिति, सरकार की तैयारियों और राजनीतिक दलों की भागीदारी पर है। यह कदम भारत की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति में पारदर्शिता बढ़ाने का अवसर भी है।

                ब्युरो रिपोर्ट  

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