बिजुरी की चीख: क्या सत्ता के रसूखदार दरिंदों को बचाने के लिए दबाई जा रही है इंसाफ की आवाज?

अनूपपुर / बिजुरी – बिजुरी में दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर हमारी कानून व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज के रसूखदार तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक नाबालिग बच्ची, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी, उसे 5 से 6 दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाकर मौत के मुंह में धकेल दिया। इस वीभत्स अपराध ने न केवल मानवता को शर्मसार किया है, बल्कि इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, वह न्याय व्यवस्था से आम जनता का भरोसा उठने लगा है।
पुलिस की कार्यशैली पर उठते गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में बिजुरी पुलिस की भूमिका शुरुआत से ही अत्यंत संदेहास्पद और पक्षपातपूर्ण नजर आ रही है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं। कि पुलिस मामले की निष्पक्ष जांच करने के बजाय इसे दबाने और लीपापोती करने में जुटी है। जब एक मासूम की अस्मत लूटी गई और उसकी जान चली गई, तब पुलिस की प्राथमिकता दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने की होनी चाहिए थी। लेकिन इसके विपरीत, दो निर्दोष कबाड़ वा कोयला चोर को उक्त मामले में थोप कर जेल तो भेज दिया लेकिन अभी भी मुख्य आरोपी पुलिस के पकड़ से दूर है जांच की धीमी रफ्तार और ढुलमुल रवैया कुछ और ही बयां कर रहा है।
चश्मदीद गवाह की ‘संदेहास्पद’ मौत: हादसा या सोची-समझी साजिश?
इस मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ ओर आया है।जब घटना के इकलौते चश्मदीद गवाह की लाश रेलवे ट्रैक पर बरामद हुई।
क्या यह महज एक इत्तेफाक है? बिल्कुल नहीं।
मुख्य गवाह की इस तरह रहस्यमय परिस्थितियों में मौत होना साफ तौर पर इशारा करता है कि सच को सामने आने से रोकने के लिए किस हद तक साजिश रची जा रही है।
भाजपा का एक रसूखदार और रंगेहाथ पकड़े जाने के डर से बौखलाए अपराधी ही गवाह को रास्ते से हटाने का दुस्साहस कर सकते हैं। पुलिस का इस मौत को सामान्य मानकर चलना या गंभीरता से न लेना उनकी नीयत पर बड़ा सवालिया निशान लगता है।
पैसा और रसूख क्या कानून से बड़े हैं ‘बड़े बाप के बेटे’?
छेत्र में यह चर्चा आम है कि इस जघन्य कृत्य में कुछ भाजपा के अमीर और रसूखदार परिवारों के लड़के शामिल हैं। पैसे और राजनीतिक पहुंच के दम पर कानून को अपनी जेब में रखने का अहंकार इन रसूखदारों के चेहरों पर साफ देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस प्रशासन इन “बड़े बाप के बेटों” को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा हो गया है।
सवाल यह उठता है: क्या इस देश में न्याय की कीमत किसी की तिजोरी तय करेगी? क्या एक गरीब और लाचार परिवार की बेटी की जिंदगी की कीमत इन रसूखदारों के पैसों के आगे कुछ भी नहीं है?
अब चुप रहने का वक्त नहीं है
बिजुरी की यह घटना केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम के सड़ चुके हिस्से का जीवंत उदाहरण है। यदि आज हम इस अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तो कल किसी और की बेटी इस दरिंदगी और भ्रष्ट तंत्र का शिकार बनेगी।
समाज की मांगें स्पष्ट है।
उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच: इस मामले की जांच बिजुरी पुलिस से हटाकर किसी स्वतंत्र एजेंसी (जैसे सीआईडी या सीबीआई) या उच्चाधिकारियों की निगरानी में एसआईटी (SIT) को सौंपी जाए।
गवाह की मौत की न्यायिक जांच: चश्मदीद गवाह की रेलवे ट्रैक पर हुई मौत की गहन फॉरेंसिक और न्यायिक जांच हो, ताकि हत्या की साजिश का पर्दाफाश हो सके।
दोषियों को चिन्हित कर मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में की जाए और उन्हें फांसी की सजा दिलाई जाए।
बिजुरी की बेटी को इंसाफ दिलाना सिर्फ उसके परिवार की लड़ाई नहीं है, यह पूरे मानव समाज की लड़ाई बन चुका है जो हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है। पैसों की धमक और खाकी के संरक्षण में पल रहे अपराधियों को यह अहसास कराना जरूरी है कि कानून से बड़ा कोई नहीं होता।
ब्युरो रिपोर्ट




