जंतर-मंतर पर प्रतिबंध का विरोध करेंगे _रघु ठाकुर संरक्षक लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी

दिल्ली / – इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने 10 अगस्त को दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी थी । इस प्रदर्शन में उनके अनुसार केवल 75 लोगों को शामिल होना था। परंतु पुलिस ने उन्हें अनुमति प्रदान नहीं की। इसको लेकर उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका पेश की थी।
इस पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस अमित महाजन ने केंद्र सरकार से पूछा है कि- ‘जंतर मंतर पर प्रदर्शन बंद क्यों नहीं कर देते?’
यह आश्चर्य की बात है कि जिस न्यायपालिका के ऊपर संविधान की रक्षा का दायित्व है संविधान में दिए गए मूल अधिकार के खंड में एक व्यक्ति को शांतिपूर्ण विरोध की अभिव्यक्ति करने का अधिकार दिया गया है। पर हाई कोर्ट बजाय इसके कि सरकार को अनुमति देने के लिए कहता, उल्टा सरकार से कह रहा है कि जंतर मंतर को प्रतिबंधित क्यों नहीं कर देते ?
इस पर से सरकारी वकील ने तत्काल कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचार हेतु लंबित है।
यह सरकार का षडयंत्र है कि सरकार अब जन प्रतिरोध को या लोगों के विरोध को बंद करना चाहती है समाप्त करना चाहतीं है।
जंतर मंतर एक बीचों-बीच का इलाका है जहां पर छोटे प्रदर्शन 400 _500 की संख्या वाले आसानी से हो जाते हैं। परंतु अब सरकार षडयंत्र कर रही है कि इन्हें भी जंतर मंतर पर रोक दिया जाए और कहीं दूर फेंक दिया जाए, ताकि कोई प्रदर्शन ही ना हो पाए।
यह आम जनता के मूल अधिकारों को समाप्त करने का और लोकतांत्रिक अधिकार शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा के अधिकार को समाप्त करने का सरकार का षडयंत्र है। पर दुखद है कि इस सरकार के हथकंडे में न्यायपालिका बजाय सरकार के कदमों को रोकने के एकदम आगे अपनी ओर से जा रही है।
जो लोग जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हैं और जो लोग नियमों का पालन नहीं करते हैं वह भूल जाते हैं कि वह जनता के ही आम लोगों के ही मानवीय और संविधानिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने के हथियार बन जाते हैं । देश के लोगों को इस का विरोध करना चाहिए ।
पहले भी सरकार ने जंतर मंतर पर रोक लगाई गई थी जिसके खिलाफ लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी ने धरना दिया था मांग की थी पत्र भेजे थे और काफी अखबारों ने इसमें सहयोग प्रदान किया था। उसके बाद यह प्रतिबंध हटा था। पर अब इसे पुनः लाने की मानसिक तयारी सरकार कर चुकी है ऐसा लगता है।
हालांकि लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी फिर इसका विरोध करेगी और न्यायपालिका से भी अपील करेगी कि ऐसे विषयों पर जो संविधानिक और मूल अधिकार के खिलाफ हैं उन पर विचार व निर्णय करने के पहले प्रतिपक्ष और जनता के प्रतिनिधियों को भी सुनवाई का अवसर देना चाहिए ।
ब्युरो रिपोर्ट




