मनेंद्रगढ़ वनमंडल में सूचना का अधिकार ( RTI ) कानून दम तोड़ता आया नजर, कैशबुक देने से बच रहे अधिकारी, शासन के आदेश की कर रहे अनदेखी। इस मामले में उच्चाधिकारियों ने भी साधी चुप्पी।
जन सूचना अधिकारी नियमों के विपरीत “व्यक्तिगत जानकारी” का हवाला देकर सूचना देने से कर रहे इनकार।

एमसीबी / – मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के मनेंद्रगढ़ वनमंडल में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पारदर्शिता के लिए बनाए गए इस कानून को ही जिम्मेदार अधिकारी ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं। बहरासी, मनेंद्रगढ़ और बिहारपुर वन परिक्षेत्रों में पदस्थ जन सूचना अधिकारी, रेगुलर मद और कैंपा मद के खर्चों की जानकारी देने से लगातार बचते दिखाई दे रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, जब आवेदकों द्वारा कैशबुक और व्यय विवरण मांगा जाता है, तो जन सूचना अधिकारी नियमों के विपरीत “व्यक्तिगत जानकारी” का हवाला देकर सूचना देने से इनकार कर रहे हैं। जबकि छत्तीसगढ़ सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) और राज्य सूचना आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि शासकीय मदों से संबंधित कैशबुक, व्यय और वित्तीय अभिलेख सार्वजनिक सूचना की श्रेणी में आते हैं और इन्हें देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जानकारी के बावजूद टालमटोल का यह रवैया कई सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय आरटीआई कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव का कहना है कि “बार-बार आवेदन देने और अपील करने के बाद भी जानकारी नहीं मिल रही है। प्रथम अपील स्तर पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, जिससे आवेदकों को राज्य सूचना आयोग तक जाना पड़ता है।” उन्होंने बताया कि आयोग में अपीलों का अंबार लगा हुआ है और एक-एक मामले की सुनवाई में 2 से 3 साल तक का समय लग रहा है।
छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी निर्देशों और राज्य सूचना आयोग के कई आदेशों में यह साफ किया गया है कि सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ी जानकारी किसी भी स्थिति में छिपाई नहीं जा सकती। इसके बावजूद वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इन आदेशों को दरकिनार कर रहे हैं, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिले के उच्च अधिकारी भी इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। जिला स्तर पर RTI प्रकरणों की नियमित समीक्षा नहीं होने के कारण निचले स्तर के अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। नियमों के अनुसार, जिला कलेक्टर और विभागीय प्रमुखों को समय-समय पर सूचना के अधिकार अधिनियम के पालन की समीक्षा करनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा होता नजर नहीं आ रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर सख्ती नहीं बरती गई तो RTI कानून का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। कानून का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना था, लेकिन मौजूदा हालात में यह उद्देश्य अधूरा नजर आ रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर दोषी जन सूचना अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर RTI कानून यूं ही कागजों तक सिमट कर रह जाएगा। जिले के जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि शासनादेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर सख्त विभागीय कार्रवाई की जाए, ताकि आम जनता का इस कानून पर विश्वास बना रह सके।
ब्युरो रिपोर्ट



