कोर्ट को दरकिनार कर ऑफलाइन खेल…
बिलासपुर तहसील की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल, नामांतरण-बंटवारा से खाता विभाजन तक लंबित प्रकरणों पर उठे सवाल।

बिलासपुर/ – और राजस्व से जुड़े मामलों में कथित देरी तथा कार्यप्रणाली को लेकर बिलासपुर तहसील कार्यालय एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नामांतरण, बंटवारा, खाता विभाजन और राजस्व अभिलेखों में प्रविष्टि जैसे मामलों में बढ़ती पेंडेंसी के बीच मोपका और जुना बिलासपुर क्षेत्र से जुड़े कुछ राजस्व प्रकरणों के कथित रूप से ऑफलाइन संचालित होने को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई प्रकरण निर्धारित ऑनलाइन व्यवस्था में दर्ज होने के बजाय कागजी फाइलों के माध्यम से आगे बढ़ाए जा रहे हैं। सबसे गंभीर आरोप कथित तौर पर सुविधा शुल्क के आधार पर काम की गति प्रभावित होने का है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिन मामलों में कथित रूप से ‘भेंट-पूजा’ नहीं होती, वे लंबे समय तक लंबित रहते हैं, जबकि प्रभावशाली अथवा कथित रूप से भुगतान करने वाले पक्षकारों के प्रकरण अपेक्षाकृत तेजी से निपटाए जाने के आरोप हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है, लेकिन शिकायतों ने तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
ई-कोर्ट व्यवस्था के बीच ऑफलाइन प्रकरण क्यों?
राजस्व न्यायालयों में ऑनलाइन व्यवस्था लागू करने का प्रमुख उद्देश्य कार्यवाही में पारदर्शिता बढ़ाना और पक्षकारों को अपने प्रकरण की स्थिति, अगली सुनवाई, आदेश तथा अन्य कार्रवाई की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि कोई राजस्व प्रकरण नियमित ऑनलाइन व्यवस्था से बाहर रखकर ऑफलाइन संचालित किया जा रहा है तो उसके औचित्य और वैधानिक आधार को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
मोपका और जुना बिलासपुर क्षेत्र से जुड़े कथित ऑफलाइन प्रकरणों को लेकर अब कई सवाल सामने आ रहे हैं –
ऐसे कितने मामले हैं? वे ई-कोर्ट में दर्ज क्यों नहीं हैं? उन्हें ऑफलाइन संचालित करने की अनुमति किस अधिकारी ने दी? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश या शासन का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है? और इन प्रकरणों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है या नहीं?
किसके आदेश पर चल रही है ऑफलाइन व्यवस्था?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में राजस्व प्रकरण को ऑफलाइन संचालित करने की अनुमति है तो संबंधित आदेश, शासन निर्देश या सक्षम अधिकारी की स्वीकृति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि ऐसी कोई अनुमति नहीं है तो फिर ऑफलाइन फाइलों के संचालन की जिम्मेदारी तय कर उसकी जांच की जानी चाहिए। पारदर्शिता के लिए यह भी जरूरी होगा कि जिला प्रशासन तहसील कार्यालय में लंबित सभी ऐसे प्रकरणों की सूची तैयार कर उनकी स्थिति की समीक्षा करे और यह पता लगाए कि ऑनलाइन दर्ज न होने के पीछे वास्तविक कारण क्या है।
पेंडेंसी ने बढ़ाई परेशानी
नामांतरण, बंटवारा और खाता विभाजन जैसे मामले आम नागरिक की जमीन, संपत्ति और आर्थिक हितों से सीधे जुड़े होते हैं। इन मामलों में अनावश्यक देरी से न केवल पक्षकारों को बार-बार तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं, बल्कि जमीन की बिक्री, ऋण, उत्तराधिकार और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
ऐसे में किसी राजस्व फाइल का महीनों तक लंबित रहना महज प्रशासनिक देरी नहीं माना जा सकता। यदि किसी मामले में जानबूझकर देरी अथवा पक्षपात के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह राजस्व प्रशासन की निष्पक्षता और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय होगा।
शिकायतें पहुंचेंगी कलेक्टर से मुख्यमंत्री तक
तहसील कार्यालय की कथित कार्यप्रणाली से परेशान अनेक पक्षकार अब मामले को जिला प्रशासन के समक्ष उठाने की तैयारी में हैं। शिकायतकर्ताओं के अनुसार वे लंबित प्रकरणों, कथित ऑफलाइन संचालन और कार्यवाही में कथित भेदभाव से जुड़े दस्तावेजों के साथ कलेक्टर से लेकर शासन स्तर तक शिकायत करने की तैयारी कर रहे हैं।
अब जिला प्रशासन की परीक्षा
पूरे मामले में आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि जिला प्रशासन शिकायतों को महज आरोप मानकर नजरअंदाज करने के बजाय बिलासपुर तहसील में लंबित राजस्व प्रकरणों, ऑनलाइन-ऑफलाइन रिकॉर्ड, फाइलों की आवाजाही, आदेशों की तिथियों और प्रकरणों के निपटारे की गति की निष्पक्ष जांच कराए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मोपका और जुना बिलासपुर क्षेत्र के कितने प्रकरण ऑनलाइन व्यवस्था में दर्ज हैं और कितने ऑफलाइन चल रहे हैं। यदि ऑफलाइन प्रकरणों के संचालन का कोई वैधानिक आधार है तो उसे सार्वजनिक किया जाए और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए। बहरहाल, बिलासपुर तहसील की कथित ऑफलाइन कार्यप्रणाली, बढ़ती पेंडेंसी और सुविधा शुल्क से जुड़े आरोपों ने जिला प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है..क्या राजस्व व्यवस्था वास्तव में पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से संचालित हो रही है? अब निगाहें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट




