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BRICS में सब कुछ ठीक है? ब्राजील के राष्ट्रपति की गैरमौजूदगी और सऊदी के रुख पर भारत के जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ने उठाए सवाल।

ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की गैरमौजूदगी ने कूटनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने इसे खास बताते हुए सऊदी अरब के ब्रिक्स रुख को लेकर भी ‘सोच-समझकर बनाए रखी गई अस्पष्टता’ पर सवाल उठाए हैं।

नई दिल्ली: ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की गैरमौजूदगी कूटनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बनी है। जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि लूला की अनुपस्थिति खास तौर पर ध्यान देने वाली है। इसकी वजह यह है कि वह 2009 में बने मूल ब्रिक समूह के चार देशों के नेताओं में अब अकेले ऐसे मौजूदा नेता हैं, जो अभी भी अपने पद पर हैं।

ब्राजील ने विदेश मंत्री को भेजा

ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, ब्राजील की तरह कुछ अन्य ब्रिक्स देशों ने भी शिखर सम्मेलन में अपने शीर्ष नेतृत्व के बजाय वरिष्ठ प्रतिनिधियों को भेजा है। ब्राजील की ओर से राष्ट्रपति लूला की जगह विदेश मंत्री माउरो विएरा सम्मेलन में शामिल हुए। चेलानी ने इस घटनाक्रम को ब्रिक्स के बदलते स्वरूप और सदस्य देशों के अलग-अलग कूटनीतिक रुख के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।

यूएई और सऊदी अरब का भी अलग रुख

चेलानी ने अपने पोस्ट में ब्रिक्स के दो नए सदस्यों संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इन दोनों देशों ने भी शिखर सम्मेलन में अपने राष्ट्राध्यक्षों के बजाय विदेश मंत्रियों को प्रतिनिधित्व के लिए भेजा। इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रिक्स के विस्तार के बाद नए सदस्य देशों का समूह के प्रति जुड़ाव और भागीदारी का स्तर एक जैसा नहीं है।

सऊदी अरब की सदस्यता पर बनी अस्पष्टता

चेलानी ने सऊदी अरब के रुख को ब्रिक्स को लेकर ‘सोच-समझकर अपनाई गई अस्पष्टता’ बताया। उनके अनुसार, सऊदी अरब ने अब तक ब्रिक्स में औपचारिक सदस्यता प्रक्रिया पूरी नहीं की है और न ही उसने स्पष्ट रूप से खुद को पूर्ण सदस्य घोषित किया है। इसके बजाय वह ब्रिक्स में अपनी भागीदारी को ‘आमंत्रित अतिथि’ के तौर पर पेश करता रहा है। चेलानी के मुताबिक, यही वजह है कि नई दिल्ली में सऊदी अरब की भागीदारी भी ब्रिक्स के भीतर उसके मौजूदा रुख को लेकर सवाल खड़े करती है।

ब्यूरो रिपोर्ट

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