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समीक्षा घमासान: अरशद वारसी के बेहतरीन अभिनय पर भारी पड़ी धीमी गति, प्रभावशाली नहीं बनी फिल्म

तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘घमासान’ उस दौर की याद दिलाती है, जब हिंदी सिनेमा में अपराध की कहानियां चमक-दमक और नायकत्व के बजाय जमीन से जुड़ी हुई दुनिया, धूल, डर और राजनीति के बीच कही जाती थीं। फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि में एक ईमानदार अधिकारी और आतंक का पर्याय बन चुके डकैत के टकराव को सामने रखती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका वातावरण, निर्देशन और कलाकारों का अभिनय है। वहीं कहानी का सीधा रास्ता और दूसरे हिस्से में कुछ जगहों पर धीमी पड़ती गति इसे पूरी तरह प्रभावशाली फिल्म बनने से रोकती है।
‘घमासान’ कोई ऐसी अपराध कथा नहीं है जो अपनी कहानी के कारण हिंदी सिनेमा में नया रास्ता बनाती हो। इसकी असली ताकत उस कहानी को कहने के तरीके में है। तिग्मांशु धूलिया का सधा हुआ निर्देशन, बुंदेलखंड का कठोर माहौल और कलाकारों का प्रभावी अभिनय फिल्म को साधारण पुलिस-बनाम-डकैत कहानी से ऊपर उठाते हैं।
कहानी में अपराध से ज्यादा व्यवस्था का चेहरा

कहानी महाराज के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बुंदेलखंड के जंगलों में अपने गिरोह के साथ आतंक कायम किए हुए है। स्थानीय लोग उससे डरते हैं और पुलिस तथा राजनीतिक तंत्र का एक हिस्सा उसके साथ मिला हुआ है। ऐसे माहौल में विपक्षी नेता कुमारी सरोजिनी लगातार महाराज के खिलाफ आवाज उठाती हैं। सरकार पर दबाव बढ़ता है और लखनऊ में तैनात ईमानदार अधिकारी आदित्य सिंह को विशेष बल की टीम के साथ उस इलाके में भेजा जाता है।
आदित्य को जिम्मेदारी दी जाती है कि वह महाराज की गतिविधियों पर लगाम लगाए और चुनाव प्रक्रिया को बिना बाधा पूरा करवाए। शुरुआत में व्यवस्था यह मानकर चलती है कि चुनाव समाप्त होने के बाद अधिकारी और उसकी टीम वापस लौट आएगी। लेकिन आदित्य सिर्फ आदेश पूरा करके लौटने वाला अधिकारी नहीं है। वह महाराज के खिलाफ कार्रवाई को अपने मिशन की तरह लेता है और यहीं से फिल्म का असली संघर्ष शुरू होता है।
कहानी का आधार भले ही बहुत नया नहीं है—एक ईमानदार पुलिस अधिकारी बनाम एक ताकतवर अपराधी—लेकिन फिल्म इसे जिस माहौल में रखती है, वह इसे देखने लायक बनाता है। यहां अपराध सिर्फ बंदूक और हिंसा का खेल नहीं है, बल्कि उसके पीछे राजनीति और सत्ता का भी एक मजबूत दबाव दिखाई देता है।

कसावट भरा निर्देशन
फिल्म का निर्देशन तिग्मांशु धूलिया की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहानी को जरूरत से ज्यादा सजाने के बजाय सीधे और सख्त अंदाज में पेश किया है। फिल्म में जबरन रोमांस, कहानी रोकने वाले गीत या नायक के लिए तालियां बटोरने वाले संवाद नहीं हैं। घटनाएं जिस तरह आगे बढ़ती हैं, उनमें एक तरह की खुरदरी वास्तविकता बनी रहती है। आदित्य और उसकी पत्नी अपर्णा के बीच के छोटे-छोटे संवाद भी कहानी से अलग नहीं लगते। ये हिस्से चरित्रों को मानवीय बनाते हैं और मुख्य कथा की गंभीरता को नुकसान पहुंचाए बिना रिश्ते की झलक देते हैं। कुछ जगहों पर कहानी की गति धीमी पड़ती है और इसके मोड़ उम्मीद के मुताबिक चौंकाने वाले नहीं हैं, लेकिन फिल्म का गंभीर वातावरण और कई दमदार दृश्य इसकी कमियों पर काफी हद तक भारी पड़ते हैं।
तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों की एक खासियत उनके अपराधी चरित्रों में दिखाई देती है और ‘घमासान’ में भी महाराज का चरित्र अच्छी तरह उभरता है। वह सिर्फ इसलिए खतरनाक नहीं लगता कि उसके हाथ में बंदूक है, बल्कि उसकी मौजूदगी ही डर पैदा करती है। उसके सामने आने पर कहानी का तनाव अपने आप बढ़ जाता है। यही वजह है कि दर्शक आदित्य की जीत देखना चाहता है।

अपनी इमेज को तोड़ने में सफल रहे अरशद वारसी
‘घमासान’ का सबसे बड़ा आकर्षण अरशद वारसी हैं। जिस अभिनेता को दर्शक लंबे समय से हास्य और हल्के-फुल्के किरदारों में देखते आए हैं, उन्हें यहां देखकर शुरुआत में ही अहसास होता है कि यह वही अरशद नहीं हैं। महाराज के रूप में उनका चेहरा, बोलने का अंदाज, शरीर की भाषा और आंखों में दिखाई देने वाली कठोरता मिलकर एक भयावह व्यक्तित्व तैयार करती है।
अरशद ने महाराज को सिर्फ खलनायक की तरह नहीं निभाया, बल्कि उसके भीतर मौजूद हिंसा और सत्ता के अहंकार को भी अपने अभिनय से सामने रखा है। उनके कई दृश्य ऐसे हैं जहां बिना किसी बड़े संवाद के भी उनका किरदार असर छोड़ जाता है। यह उनके करियर के उन प्रदर्शनों में शामिल किया जा सकता है जहां अभिनेता ने अपनी स्थापित छवि से बाहर निकलकर खुद को साबित किया है।
प्रतीक गांधी आदित्य के रूप में संतुलित प्रदर्शन करते हैं। हालांकि कई मौकों पर अरशद वारसी का प्रभाव इतना मजबूत है कि उनका किरदार थोड़ा पीछे दिखाई देता है, लेकिन प्रतीक अपने चरित्र की दृढ़ता बनाए रखते हैं। उनके अभिनय में अनावश्यक आक्रामकता नहीं है और यही बात आदित्य को विश्वसनीय बनाती है।
आकर्षित करते हैं राजपाल यादव

राजपाल यादव के लिए भी यह भूमिका उनकी सामान्य छवि से अलग है। उनका किरदार कहानी में महत्वपूर्ण है और वह कई जगहों पर गंभीरता के बीच सहज हास्य भी पैदा करता है। यह संतुलन फिल्म को लगातार बोझिल होने से बचाता है। जतिन गोस्वामी एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का परिचय देते हैं। ईशिता दत्ता की भूमिका सीमित है, लेकिन वह अपने हिस्से को प्रभावी ढंग से निभाती हैं। दीप राज राणा, सीमा आजमी, पंकज सरस्वत, मृत्युंजय पांडे, पारितोष सैंड, अनुराग ठाकुर और हेमंत दंडोतिया जैसे कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं।
कहानी की सादगी ही ताकत और कमजोरी दोनों
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी उसकी कहानी ही है। पुलिस अधिकारी और अपराधी के बीच संघर्ष का मूल ढांचा काफी परिचित है। कहानी में ऐसे अप्रत्याशित मोड़ बहुत ज्यादा नहीं हैं जो दर्शक को लगातार चौंकाते रहें। फिल्म का जोर घटनाओं के प्रभाव और माहौल पर अधिक है। दूसरे हिस्से में कुछ समय के लिए कथा की रफ्तार कम महसूस होती है। बलराम यादव और आदिवासी बच्चों से जुड़ा प्रसंग भी उतनी गहराई से विकसित नहीं हो पाता, जितनी उससे उम्मीद बनती है। फिल्म के अंत में एक अप्रत्याशित मोड़ जरूर आता है, लेकिन उसका प्रभाव उतना तीखा नहीं है जितना इस पूरी कहानी को देखते हुए होना चाहिए था।

इसके बावजूद इंटरवल से पहले और बाद के कुछ दृश्य फिल्म की पकड़ बनाए रखते हैं। महाराज को यह पता चलना कि लखुआ उसके साथ विश्वासघात कर चुका है, आदित्य और महाराज की पहली बातचीत तथा इंटरवल से पहले का घटनाक्रम खासा प्रभाव छोड़ता है। अपर्णा का अपहरण और आदित्य का अपने वरिष्ठ अधिकारी का फोन सुनना भी तनाव पैदा करता है। प्री-क्लाइमेक्स विशेष रूप से प्रभावशाली है और यहां फिल्म अपनी गति फिर पकड़ लेती है।

तकनीकी पक्ष में वास्तविकता का असर

फिल्म का संगीत ऐसा नहीं है जिसे दर्शक देखने के बाद लंबे समय तक याद रखे, हालांकि ‘धाए धाए’ कहानी के माहौल के अनुरूप है। पार्श्व संगीत फिल्म के तनाव और वातावरण के साथ बेहतर तालमेल बैठाता है।
देव अग्रवाल की सिनेमैटोग्राफी कहानी की खुरदरी दुनिया को प्रभावी रूप से सामने लाती है। निर्माण डिजाइन और वेशभूषा भी फिल्म के परिवेश के अनुरूप रखी गई है। फिल्म में मारधाड़ उसी तरह की है जैसी आमतौर पर डकैतों के फिल्मों में होती है। आमने-सामने गोलियों की बौछार और उसके बीच बचते, मारते और मरते किरदार। फिल्म की एडिटिंग अच्छी है लेकिन कुछ दृश्यों को और सम्पादित किया जा सकता था।
अगर आपको जमीन से जुड़ी, हिंसक और राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली अपराध कहानियां पसंद हैं, तो ‘घमासान’ एक बार देखने लायक फिल्म है।

ब्यूरो रिपोर्ट

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