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एसीजेएम ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया’, सोनिया गांधी के खिलाफ FIR की अर्जी पर दिल्ली कोर्ट का बड़ा फैसला

सोनिया गांधी नागरिकता विवाद से जुड़े एक मामले में FIR खारिज करने वाला निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया गया है।

दिल्ली / – सोनिया गांधी का नाम नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने के आरोप की जांच फिर से शुरू हो सकती है। दिल्ली की एक कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया है। मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में सोनिया गांधी के नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले मतदाता सूची में शामिल किए जाने के आरोप की जांच से इनकार किया गया था।

दिल्ली की द्वारका कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि मजिस्ट्रेट का आदेश बिना ठोस कारण बताए दिया गया था और इससे पता चलता है कि मामले पर ठीक से विचार नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में शिकायत को अधूरा बताया गया था और इसमें कानून की स्पष्ट गलती थी।

क्या था मामला?

पिछले साल सितंबर में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने एक याचिका खारिज कर दी थी, याचिका में कहा गया था कि 1980 में नागरिकता लेने से तीन साल पहले ही सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में फर्जी तरीके से शामिल कर दिया गया था। यह शिकायत एडवोकेट विकास त्रिपाठी ने की थी, जिसे सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील पवन नारंग ने प्रेजेंट किया था।

आदेश पूरी तरह निरर्थक है- कोर्ट

लाइव लॉ के मुताबिक, द्वारका कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोग्ने ने कहा कि यह आदेश पूरी तरह निरर्थक था, जिसमें उचित नहीं था। इस मामले को 29 सितंबर को एसीजेएम के समाने पेश किया जाएगा। जज विशाल गोग्ने ने कहा कि किसी भी न्यायिक आदेश के लिए कानून को सर्वोपरि माना गया है और किसी भी आदेश को तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।

आगे कोर्ट ने कहा, वोटर लिस्ट में किसी वोटर या गैर-नागरिक के नाम के साथ छेड़छाड़ या धोखाधड़ी से शामिल किए जाने के किसी भी आरोप के लिए इस बात पर उचित आदेश देना जरूरी है कि क्या जालसाजी या धोखाधड़ी के लिए आरोप साबित हुए हैं।

आगे कहा गया कि विवादित आदेश में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई कि सोनिया गांधी का नाम 1980, 1982 और 1983 वोटर लिस्ट में किस क्रम में शामिल किया गया, हटाया गया या फिर से शामिल किया गया और शिकायत को पूरी तरह खारिज क्यों किया गया।

एसीजेएम ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया

जज ने कहा कि संज्ञेय अपराध के खुलासे पर बिना कोई कारण बताए आदेश पारित करने में एसीजेएम ने बिल्कुल भी अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। आगे कहा, संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें न सुनने और संबंधित पुलिस थाने से स्थिति की रिपोर्ट न मंगवाने के कारण विवादित आदेश में कानून की स्पष्ट त्रुटि है।

कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी करते हुए कहा कि FIR दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय, मजिस्ट्रेट का आदेश नागरिकता के मुद्दे की ओर भटक गया। इसके बाद कोर्ट ने मामले को मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया है ताकि वे ठोस कारणों के साथ आदेश जारी कर सकें और दलीलों पर फिर से सुनवाई का निर्देश दिया है।

ब्यूरो रिपोर्ट

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